“कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत: क्लेशनाशय गोबिंदाय नमों नमः”
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यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अर्पित है और उनके विभिन्न गुणों एवं नामों का वर्णन करता है। इस मंत्र का हिंदी में वर्णनात्मक अर्थ इस प्रकार है:
1. “कृष्णाय”:
यह भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित करता है, जो सृष्टि के पालनकर्ता और लीला पुरुषोत्तम हैं। “कृष्ण” का अर्थ है जो सबको आकर्षित करते हैं और आनंद के स्रोत हैं।
2. “वासुदेवाय”:
भगवान वासुदेव के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण को दर्शाता है। वासुदेव का अर्थ है, “जो सबके हृदय में निवास करते हैं।”
3. “हरये”:
यह शब्द भगवान के उस रूप को संबोधित करता है जो भक्तों के दुखों को हरने वाले हैं। “हरि” का अर्थ है दुखों, कष्टों और पापों का नाश करने वाला।
4. “परमात्मने”:
यह भगवान को सर्वोच्च आत्मा (परमात्मा) के रूप में स्वीकार करता है, जो समस्त ब्रह्मांड के स्रोत और संचालनकर्ता हैं।
5. “प्रणत”:
यह उन भक्तों की ओर संकेत करता है जो भगवान के शरणागत होकर समर्पण करते हैं।
6. “क्लेश नाशाय”:
यह भगवान की उस शक्ति को दर्शाता है जिससे वे अपने भक्तों के क्लेश (दुख, समस्याएं, और कष्ट) का नाश करते हैं।
7. “गोविंदाय”:
यह भगवान के उस स्वरूप को संबोधित करता है जो गायों, पृथ्वी और इंद्रियों के पालनकर्ता हैं। गोविंद का अर्थ “जो इंद्रियों को संतुष्ट करता है” भी है।
8. “नमो नमः”:
यह भगवान को बारंबार नमन और वंदना करने की अभिव्यक्ति है।
संपूर्ण अर्थ:
“मैं भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करता हूं, जो वासुदेव के पुत्र हैं, सभी क्लेशों का नाश करने वाले, भक्तों के शरणदाता, समस्त ब्रह्मांड के परमात्मा और गोविंद हैं। मैं उन्हें बार-बार नमन करता हूं।”
यह मंत्र भक्ति, श्रद्धा और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।

